Saturday, August 14, 2010

आजाद होना चाहता हू



आज वो दिन याद आते है जब मै बच्चा था
रोज नए सपने देखता था
रोज नयी दुनिया की सेर करता था
न सपनो के टूटने का डर था
न उनके कही खोने की चिंता
बस जी जाने की हसरत थी
हर पल मै खुशया समटने के तमनना थी
अब कुछ अजीब सा है
शायद आजाद नहीं हू मै........


जीने लगा उमंग के साथ
रोज उमड़ती तरंगो के साथ
मेरे सपने थे हमेशा मेरे साथ
जिन्दगी का का पकड़कर चल रहा था मै हाथ
लकिन अब कुछ कमी सी है
शायद आजाद नहीं हू मै .......


सब कुछ तो था ,
हिम्मत थी बदलने की
भगत और आजाद की तरह अकेले डटने की
गाँधी की तरह अकेले चलने की
शास्त्री की तरह लोगो के लिया जीने की
और देश के लिया कुछ कर गुजरने की
लकिन अब कुछ कमी सी है
शायद आजाद नहीं हू मै ......

पता नहीं कब क्या से क्या हो गया
मै भी भाग दोड मै शामिल हो गया
सपनो की तिजोरी को कोई चुरा ले गया
हसरतो को कुछ जिमेदारियो ने दबा लिया
बस बदलने का जोश अपने तक ही रह गया
कोई आगे गये मै भी उसके पीछे पीछे निकल लिया
लकिन अब कुछ कमी सी है
शायद आजाद नहीं हू मै ......


अब तो बस जिन्दगी अपने तक ही हो गयी है
हर तरफ आगे बढने की होड़ हो गयी है
रिस्तो की अब वो अहमियत नहीं रह गये
आज एक दोस्त से पूछा क्या है
वो भी "तेरे मतलब का कुछ नहीं" कह गयी
अब शायद हर चीज़ अपना मतलब खो गयी
लेकिन अब कुछ कमी सी है
शायद आजाद नहीं हू मै......


कुछ आगे बढ़ा तो जिन्दगी कुछ और छोटी हो गयी
अब ये बस एक बुक ,तुतोरिअल , और अस्सिग्न्मेंट हो गयी
चीज़े इतनी बड़ी हुई की लाइफ छोटी हो गयी
अस्सिग्न्म्नेट बड़े और रिश्ते छोटे हो गये
दोस्ती अब बस प्रोजेक्ट पार्टनर तक ही रह गयी
इंसान छोटे और मार्क्स बड़े हो गये
जो कभी चाँद को चुना चाहते थे
अब बल्ब छुना काफी हो गया
लकिन कुछ कमी सी है
शायद आजाद नहीं हू मै.....

आज सोचा तो तो अपने आप पर ही शक होने लगा
कहा से चले थे और कहा आ गये
क्या करना था और क्या करने लगे
क्या सोचते थे क्या सोचने लगे
केसी दुनिया थी और अब क्या है
अब कुछ कमी सी है
शायद आजाद नहीं हू मै ..........

आज ये मन फिर उमड़ता है पाने के लिए
सभी को खुसिया देने के लिए
जीने के लिया वोपल जो आजादी से जी सके
वो दिन जीने के लिया जो आजाद थे
जीने के लिया वो जिन्दगी जो तैयार थी कुछ भी करने के लिए
जो भय मुक्त थी कुछ कहने से
जो निडर थी कुछ भी करने से
जो "इन्सुरेंसद" नहीं थी मरने के डर से
जो चाँद को लपकने के लिए आतुर थी
और सूरज के पास जाने की उत्सुक
अब बस आज होना चाहता है ये मन
कुछ बड़ा करना चाहता है ये मन
तभी ये कमी पूरी हो सकेगी
तभी मै आजाद हो पाउँगा

पता नहीं शायद मै ये समझने मै देर न कर दू
और बाद मै कहता रहू की
कुछ कमी थी
शायद मै आजाद नहीं जिया ...........